बुधवार, 22 नवंबर 2023

दस्तगीर परिवार ने नोटिस दिया तो जवाब मिला- सीरीज आपके पिता पर नहीं

दस्तगीर परिवार ने नोटिस दिया तो जवाब मिला- सीरीज आपके पिता पर नहीं



2 दिसंबर 2021 को वेब सीरीज का पहला टीजर जारी हुआ था। उसके बाद गुलाम दस्तगीर के बेटे शादाब दस्तगीर ने यशराज फिल्म्स को एक लीगल नोटिस भेजा, जिसमें लिखा कि सीरीज में जिस किरदार को दिखाया गया है वो उनके पिता की कहानी है। ये भी लिखा- जनवरी 2019 में उन्होंने इस कहानी के राइट्स स्मॉल बॉक्स प्रोडक्शन नाम की कंपनी को दिए हैं।

इस बात पर भी नाराजगी जताई कि सीरीज बनाने से पहले यशराज फिल्म्स ने परिवार से मिलना तक जरूरी नहीं समझा। बगैर इजाजत बनी सीरीज में कोई गलत जानकारी उनके पिता और परिवार की छवि को खराब कर सकती है
लीगल नोटिस के जवाब में यशराज फिल्म्स ने लिखा- पब्लिक डोमेन में जितनी जानकारियां उपलब्ध थीं, उसके आधार पर ही यह सीरीज बनाई गई है। सिर्फ 50 सेकेंड के टीजर से आप ये कैसे कह सकते हैं कि इससे आपके पिता या आपके परिवार की छवि को गलत तरीके से सामने लाया जा सकता है?

राइट्स किसी और को बेचे जाने के सवाल पर नेटफ्लिक्स ने जवाब दिया कि यह सीरीज जब पूरी तरह से बनकर तैयार हो गई थी, उसके बाद जुलाई 2021 में इसके राइट्स किसी और को दिए गए थे। यह सीरीज गुलाम दस्तगीर की कोई बायोग्राफी या उनकी जिंदगी पर बनाई गई स्टोरी नहीं है, इसलिए यशराज फिल्म्स और नेटफ्लिक्स ने किसी भी तरह का कोई उल्लंघन नहीं किया है।



फैक्ट के साथ जमकर छेड़छाड़ की गई- शादाब दस्तगीर गुलाम दस्तगीर के दोनों बेटे नायाब और शादाब दस्तगीर भोपाल के कोहेफिजा में रहते हैं। सीरीज देखने के बाद उनका कहना है- फैक्ट्स और फिक्शन मिक्स कर दिया है, जिससे असली किरदार की भूमिका दब गई है। उस रात के बारे में जितना हमें पता है, शायद किसी और को न हो।

शादाब कहते हैं- सीरीज में इमाद नाम का एक किरदार बताया गया है, जिसकी मदद से इफ्तिखार सिद्दकी सारा इंतजाम करते हैं। हकीकत में ऐसा कोई किरदार ही नहीं था। रेलवे में जॉइनिंग के पहले ही दिन उसे बिना ट्रेनिंग के सिग्नल ठीक करते और ट्रेन चलाते दिखा दिया गया। रेलवे के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ कि कोई व्यक्ति जॉइनिंग के पहले दिन लोको पायलट बनकर ट्रेन चला रहा हो।

इसी तरह मंदिरा बेदी को एक सिख महिला के रूप में दिखाया गया है। जबकि ऐसा कुछ हुआ नहीं था। जो बताता है कि इनके पास रिसर्च के नाम पर कुछ भी नहीं था।

सरकार और रेलवे से कभी कोई सम्मान नहीं मिला- नायाब दस्तगीर

39 साल पहले जब गैस रिसाव की घटना हुई थी, तब नायाब की उम्र 17 साल और शादाब की उम्र 14 साल थी। नायाब बताते हैं- गैस की चपेट में आने के बाद पिताजी कभी स्वस्थ नहीं रह पाए। पानी पीने से पहले दर्द कम करने के लिए स्टेरॉयड लेते थे क्योंकि उनके गले में घाव हो गया था। मुआवजे के तौर पर 55 हजार रुपए मिले थे। गैसकांड के चार साल बाद 1988 में वे रिटायर हो गए। उनके इलाज में सारी जमा पूंजी खत्म हो गई।

नायाब बताते हैं- पिताजी ने हाउसिंग बोर्ड का एक डुप्लेक्स बुक किया था, मगर उनकी बीमारी के कारण वो कोई किस्त जमा नहीं कर पाए। उसका ब्याज 12 लाख रुपए से बढ़कर 23 लाख रुपए हो गया। 2003 में उनके इंतकाल के बाद ब्याज को माफ करवाने के लिए हमने हाउसिंग बोर्ड से लेकर मुख्यमंत्री दफ्तर के चक्कर काटे। डेथ सर्टिफिकेट में मौत का कारण मिथाइल आइसोसाइनेट के इन्फेक्शन से किडनी और लिवर डैमेज बताया गया था।

उस समय बाबूलाल गौर मुख्यमंत्री थे। उन्होंने कहा- वो कोई

मदद नहीं कर सकते। भोपाल गैसकांड पीड़ितों की केंद्र

सरकार के तय मानकों के आधार पर मदद की जा रही है।

अलग से मदद करने के लिए उनके पास कोई फंड नहीं है। जब

पर खेलकर हजारों जिंदगियां बचाई। मगर इन्होंने एक मेडल या सर्टिफिकेट तक नहीं दिया।

यशराज फिल्म्स से हमें कुछ भी नहीं चाहिए - दस्तगीर परिवार गुलाम दस्तगीर के परिवार ने यशराज फिल्म्स को भले ही लीगल नोटिस भेजा हो, लेकिन इसके बदले उन्हें कुछ नहीं चाहिए। शादाब दस्तगीर कहते हैं- इस बात की तकलीफ है कि मेरे पिता की कहानी पर पूरी सीरीज बना दी। हमसे पूछा तक नहीं गया। सीरीज में किरदार का नाम इफ्तिखार सिद्दकी क्यों रखा गया? गुलाम दस्तगीर रखने में क्या परेशानी थी?

हमें कुछ नहीं चाहिए बस इतनी इच्छा है कि वो हमारे पिता के असली नाम का इस्तेमाल करें। सीरीज की शुरुआत में एक छोटा सा ट्रिब्यूट दें, ताकि दुनिया को पता चल सके कि वो शख्स गुलाम दस्तगीर था, जिसने हजारों लोगों की जान बचाई और बदले में कुछ नहीं मांगा।

2-3 दिसंबर की दरमियानी रात क्या हुआ था भोपाल रेलवे स्टेशन पर

2 दिसंबर की आधी रात के आसपास डिप्टी स्टेशन मास्टर गुलाम दस्तगीर ने जब अपनी ड्यूटी संभाली तो भोपाल रेलवे स्टेशन पर सब कुछ सामान्य था। रात 11 बजे के आसपास का वक्त हो चला था। भोपाल होकर गुजरने वाली एक एक्सप्रेस ट्रेन रवाना हो चुकी थी। गुलाम दस्तगीर भी कागजी कार्रवाई में मशगूल थे। मुंबई से गोरखपुर जा रही 116 अप के भोपाल जंक्शन में दाखिल होते ही हालात बदल गए थे।

मध्य रेलवे की इस लंबी रूट की ट्रेन को रिसीव करने गुलाम दस्तगीर जब अपने कमरे से निकलकर वहां पहुंचे तो उन्हें गले और आंखों में जलन का अहसास होने लगा। ट्रेन में बैठे यात्रियों में से भी कुछ बुरी तरह खांसने लगे थे।

दस्तगीर ने स्टेशन पर आने वाली ट्रेनों को रोक दिया था अफरा-तफरी के माहौल में घर-बार छोड़कर भाग रहे लोगों में से कुछ ने रेलवे स्टेशन पर पनाह ली थी। ट्रेन में चढ़ने की कोशिश कर रहे थे। खतरे को भांपते ही गुलाम दस्तगीर ने ट्रेन को फौरन रवाना करने का फैसला किया। दस्तगीर ने फौरन आला अधिकारियों से संपर्क किया। उन्हें फैक्ट्री से जहरीली गैस के रिसाव की सूचना दी, ताकि भोपाल आने वाली गाड़ियों को पहले ही रोक लिया जाए।

गुलाम दस्तगीर गैस की चपेट में आ चुके थे। इसके बावजूद वो पीड़ितों और साथी कर्मचारियों को अस्पताल भेजने और उनकी मदद में जुटे हुए थे। गुलाम दस्तगीर ने ड्यूटी तभी छोड़ी जब उनकी स्थिति बिगड़ गई और उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा।

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